माया (गज़ल)
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मेरि माया थैं सौंगि सौंग्यार नि समझी ।
देर ह्वेलि पर लब्बी अग्यार नि समझी॥
ऐथर-पैथर रंगमत फूलु की डार ह्वैलि ।
हैरि पत्यूं थैं मयळ्दु मौळ्यार नि समझी॥
मुखड़ि हळ्दण्यां नि ह्वा कैकि खुद मा ।
प्योंलि का दगड़ पुरणु प्यार नि समझी ॥
ह्वेलि तेरि जाण पछ्याण सर्या मुल्क मा।
पर मि गरीब थैं खैड़ कत्यार नि समझी॥
पंगत बणै खड़ा मरचण्यां धुपणुं दिवया ।
आंसु फुंजदरौं की लंग्यार नि समझी ॥
'पयाश' की कांधिमा मुंड धैरि नि रूणुं ।
वीं जिकुड़ि तु सेळि स्यळ्यार नि समझी॥

पयाश पोखड़ा

+91 92132 27970

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